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Home    जंगल में पलाश के पत्तों ने बचा लिया इस नन्ही सी जान को…

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जंगल में पलाश के पत्तों ने बचा लिया इस नन्ही सी जान को…

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वह जंगल में जमीन पर पड़ी थी, पलाश के पत्तों से ढकी, जब बरमसिया गांव के कुछ बच्चों की नजर उस पर पड़ी। उन्होंने तुरंत गांव के लोगों को सूचित किया और जल्द ही वहां लोगों की भीड़ लग गई। उसे गांव की ही एक महिला को पालने के लिए दे दिया गया। मंगलवार को सीडब्लूसी को इस बच्ची के बारे में पता चला तो उन्होंने बच्ची को वहां से रिकवर कर लिया।

घटना धनबाद-बरवाअड्डा थाना क्षेत्र अंतर्गत बरमसिया गांव में रविवार को घटी। चाईल्ड वेलफेयर कमेटी के सदस्य श्री शंकर रवानी और पत्रकार श्री राजकुमार जायसवाल ने बताया कि बरमसिया गांव में रविवार की दोपहर कुछ बच्चे जंगल के सामने स्थित मैदान में क्रिकेट खेल रहे थे कि उसी दौरान उनकी गेंद जंगल की तरफ चली गई। उसे ढूंढते हुए जब वे उस जंगल में पहुंचे तो एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी।

डर कर बच्चों ने गांव के बड़े बुजुर्गों को बुला लिया, जिन्होंने पत्तों से ढके बच्चे को बाहर निकाला। यह लड़की थी, जिसे जन्म के तुरंत बाद ही वहां लाकर रख दिया गया था और उसकी नाल भी नहीं काटी गई थी। गांववालों ने ही उसकी नाल काटी। उन्होंने पुलिस को भी इसकी सूचना नहीं दी थी।

स्थानीय निवासी तीरथ राय तथा उनकी पत्नी जोगिया देवी ने नवजात बच्ची को गोद लेने की इच्छा जाहिर की। दोनों मजदूरी करते हैं और उनके कोई संतान भी नहीं है। उनकी अपील पर ग्रामीणों ने आपसी रजामंदी से बच्ची को उनके सुपुर्द कर दिया।

अखबार के माध्यम से इस घटना की जानकारी मिलने के बाद सीडब्लूसी ने लोकल थाने को फोन कर बच्चे को रिकवर करने का निर्देश दिया, जिसके बाद बुधवार को बच्ची को सीडब्लूसी के समक्ष लाया गया। बच्ची के साथ साथ जोगिया देवी, वहां की मुखिया ममता देवी तथा कुछ अन्य ग्रामीणों को लेकर सीडब्लूसी कोर्ट तक पहुंच गई और बच्चे को गोद देने की गुहार लगाने लगी। लेकिन कानून का हवाला देते हुए उनकी पुकार को अनसुना कर दिया गया। बच्ची अब ठीक है और फिलहाल धनबाद पीएमसीएच में एडमिट है। डिस्चार्ज होने के बाद उसे स्पेशल एडॉप्शन एजेंसी में भेज दिया जाएगा।

मालूम हो कि किसी भी बच्चे को कानूनी रूप से अब तभी गोद लिया जा सकता है, जब सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी की प्रक्रिया से वह गुजर चुका हो। यह प्रक्रिया आम लोगों के लिए पेचीदा भी है और उनकी पहुंच में भी नहीं है। आज भी भारत में अधिकांश लोगों को इसके बारे में कोई आईडिया नहीं है। यही वजह है कि आज भी किसी बच्चे के मिलने पर स्थानीय लोग उसे पालने की नीयत से अपने पास रख लेते हैं, और अकसर उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। भावनात्मक रूप से भी वे चोटिल होते हैं, और कई बार पुलिस प्रशासन की जोर जबरदस्ती का भी, हालांकि इसके लिए पुलिस प्रशासन को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि वे भी कानून से बंधे है।

इन अनचाही परिस्थितियों से निपटने के लिए जरूरी है कि बच्चों को गोद लेने-देने के जागरुकता कार्यक्रम व्यापक स्तर पर चलाए जाएं, जिससे उन लोगों को सहूलियत हो, जो या तो बच्चा गोद लेना चाहते हैं, या देना चाहते हैं।
11 फरवरी 2018 धनबाद, झारखंड (F)

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